अग्रेज

2024इ‌‌‍ङ्गलैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के काल में 1583 में राल्फ फिच (Ralph Fitch, 1550 – 1611) बादशाह अकबर के दरबार में अ‍‌ङ्ग्रेज़ व्यापारियों की सुरक्षा तथा उन्हें भारत में व्यापार करने की अनुमति देने का अनुरोध लेकर आए।

यूरोप से विश्व के अन्य देशो तक के समुद्री मार्ग खोजने के लिए पोप ने स्पेन और पुर्तगाल के मध्य बटवारा कर दिया था। जिससे 1497 से यूरोपीय देशों में मात्र पुर्तगाल का यूरोप से भारत तक के समुद्री मार्ग पर एकछत्र आधिपत्य था। और नए बाजारों और उत्पादन केन्द्रों पर स्पेन एवं पुर्तगाल के एकाधिकार से इन देशों की बढ़ती सम्पन्नता और शक्ति से यूरोप के अन्य देश चिन्तित थे; और इस नव सम्पत्तिस्रोत में अपनी भागीदारी चाहते थे। इसके लिए उनकी और से भी प्रयास होने लगे; और इन देशों के गुप्तचर पुर्तगाल के गुप्त मार्गों की खोजबीन में जुट गए।


किन्तु, व्यापारियों के अतिरिक्त एक दूसरा वर्ग भी था; वह था धर्म-प्रचारकों का। धर्म-प्रचारकों से पुर्तगाली व्यापारियों को कोई व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता न होने से विल्टशायर (Wiltshire) के अँगरेज़ थॉमस स्टेफेन्स (Thomas Stephens SJ (Society of Jesus), 1549–1619) जोकि जेसुइट पादरी थे; 24 अक्टूबर 1579 को अटलांटिक महासागर से हिन्द महासागर के मार्ग से उत्तमाशा अन्तरीप (केप ऑफ़ गुड होप / Cape of Good Hope) होते हुए गोवा पहुँचे। यहाँ उन्होंने ने कोंकणी और मराठी पढ़ना-लिखना भी सीखा; और ईसाई धर्म के प्रसार के लिए 1616 में ख्रीस्त पुराण की रचना की; और पादरी इस्तेवम (Padre Estevam) के नाम से ज्ञान-स्नान के रूप में भारतीयों का बपतिस्मा करना आरम्भ किया। वे बाद में वर्सोवा में बस गए। यद्यपि कुछ इतिहासकार यह मानते हैं 

की वे भारत पहुँचने वाले पहले अंग्रेज़ नहीं थे।

रोमन लिपि में प्रकाशित पादरी इस्तेवम के ख्रिस्तान पुराण के 1907 संस्करण का एक अंश 


ख्रिस्तान पुराण की पहली पङ्क्ति है "ओ नमो वीस्वभरीता, देवबापा सर्व समर्था परमेश्वरा सत्यवंता, स्वर्ग पृथ्वीचा रचणारा तुं रीधीसीधीचा दातारू, कृपानिधी करुणाकरुतुं सर्व सुखाचा सागरु, आदी अंतु नातुडे" (हे नमो विश्वभर्ता! आप देवपिता सर्व समर्थ परमेश्वर सत्यवन्त, स्वर्ग और पृथ्वी के रचयिता, आप धर्म के दाता, सभी सुखों को देने वाले, करुणा के सागर, आदि और अन्त हैं।)


दूसरे वर्ग (व्यापारियों) ने एक अन्य मार्ग चुना। इनमे से एक राल्फ़ फिच (Ralph Fitch; 1550 – 1611) थे। यह 1583 में अपने कुछ साथियों चित्रकार विलियम लीड्स (William Leedes), जौहरी जेम्स स्टोरी (James Story), तथा व्यापारियों जॉन न्यूबेरी (John Newberry) एवं जॉन एल्ड्रेड (John Eldred) के साथ भूमध्य सागर के मार्ग से सीरिया के अलेप्पो से होते हुए अरब प्रायद्वीप को पार कर फ़ारस की खाड़ी पर स्थित बसरा तक पहुँचे। यहाँ जॉन एल्ड्रेड ने वहीं रुकने का निर्णय लिया। किन्तु, शेष तीन के साथ फिच समुद्री मार्ग से अगस्त 1583 में भारत के गोवा तक आ गए। यहाँ उन्हें गुप्तचरी के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया; और मृत्युदण्ड देने की घोषणा हुए। किन्तु, यहाँ जेसुइट पादरियों (विशेषकर पादरी इस्तेवम) ने बीच-बचाव कर उन्हें बचा लिया।


अप्रैल 1584 में फिच, न्यूबेरी और लीड्स गोवा से भाग गए; और स्टोरी ने गोवा में रहना चुना। अब इन तीनों ने अपनी भारत में यात्रा आरम्भ की। वे 1585 में आगरा के निकट फ़तेहपुर सीकरी में मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार में गए। यहाँ लीड्स दरबारी जौहरी के रूप में बस गए। न्यूबेरी पुनः इंग्लैंड लौटने को उद्यत थे किन्तु, सम्भवतः उनकी मृत्यु भारत में ही हो गई।

तो इस घुमक्कड़ों की टोली में शेष रहे मात्र फिच ने यमुना और गङ्गा नदियों के मार्ग से वाराणसी (बनारस) और पटना की यात्रा की; फिर स्थलमार्ग से उन्होंने कूच बिहार की यात्रा की। पूर्वी बङ्गाल से यात्रा कर वह नवंबर 1586 में म्यान्मार (बर्मा) के यांगून (रंगून) क्षेत्र में पहुँचे; इरावदी नदी में नौका से यात्रा कर पेगु और स्याम देश के शान राज्यों में 1586-87 में भ्रमण किया। इसके अगले वर्ष 1588 की में फिच ने मलय प्रायद्वीप की यात्रा की और मलक्का गए जहाँ उन्होंने चीन और मलय द्वीप समूहमें मसालों के व्यापार के बारे में बहुत कुछ सीखा। 

 यहाँ से उन्होंने इंग्लैण्ड की ओर मुख किया और 29 अप्रैल 1591 को लन्दन पहुंचे। फिच के प्रत्यक्षदर्शी आलेख को ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सन्स्थापकों ने बहुत महत्व दिया, और अपना सलाहकार नियुक्त किया।


ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी की 1600 में स्थापना के उपरान्त वेस्ट इण्डीज़ की यात्रा करने वाले अन्वेषी कप्तान विलियम हॉकिन्स (William Hawkyns) के पुत्र तथा ब्रिटिश नेवी कमाण्डर जॉन हॉकिन्स (John Hawkins) के भतीजे विलियम हॉकिन्स (William Hawkins) को एक कमाण्डर नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में 24 अगस्त 1608 को कम्पनी पहले जहाज हेक्टर के भारत के सूरत में लंगर डाला। हॉकिन्स ने 1609 में सम्राट जहाँगीर से सूरत एक कारखाने खोलने के लिए अनुमति पाने के लिए आगरा की यात्रा की। इन्हें बायजूस (byjus) त्रुटिवश भारत आने पहले ब्रिटिश के रूप में मान्यता देता है। 


बादशाह जहाँगीर के दरबार में विलियम हॉकिन्स के दरबार में इंग्लैंड के सम्राट जेम्स प्रथम (जो स्कॉटलैंड के सम्राट जेम्स चतुर्थ भी थे) का पत्र प्रस्तुत करते हु

विलियम हॉकिन्स लगभग दो वर्ष भारत रहे; किन्तु, उनके द्वारा व्यापारिक लाभ में मिले स्वर्ण को समुद्री डाकुओं ने लूट लिया। और वे सूने हाथों ही घर लौट पाए।


अंग्रेज़ों की यह यात्राएँ अधिक सफल नहीं कही जा सकती हैं। क्योंकि उन्हें अपनी व्यापारिक कोठियाँ खोलने की अनुमति नहीं मिली थीं। किन्तु, यह सब उनके दसवें अभियान (1612–1614) से पलट गया।


सूरत के निकट सुवाली गाँव में पुर्तगालियों ने दो अंग्रेज़ नाविकों को पकड़ लिया। इससे क्रुद्ध होकर अंग्रेज़ कप्तान थॉमस बेस्ट (Thomas Best) ने 29 नवम्बर 1612 को पुर्तगाली जहाजों पर धावा बोल दिया। इस झड़प में पुर्तगालियों को भारी हानि हुई; 

दिन के उजाले में, रेड ड्रैगन (Red Dragon) में कप्तान बेस्ट चार पुर्तगाली जहाजों पर धावा बोल कर उनमें से तीन को छिछले पानी में फँसा दिया। यद्यपि, पुर्तगाली इन्हें पुनः तैराने में सफल रहे कप्तान बेस्ट को दीव में अपने प्रभुत्व स्थापित करने का अवसर मिल गया। इससे थॉमस बेस्ट मुग़ल सिपहसालार को प्रभावित करने में भी सफल हुए; और अंग्रेज़ों को व्यापारिक कोठी स्थापित करने के लिए एक अच्छी अनुशंसा मिल गई।


इस सफलता के उपरान्त इंग्लैंड ने मुगलों से पुनः व्यापारिक अनुमति पाने के लिए प्रयास किये।

यह अनुमति उन्हें सर थॉमस रो (Thomas Roe, 1581 – 1644) के प्रयासों से मिली। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी के अतिरिक्त उन्हें मुग़ल दरबार में इंग्लैण्ड के सम्राट जेम्स प्रथम का राजदूत (1615 से 1618 तक) भी नियुक्त किया गया था। 



ध्यान दें कि जर्मन मिशिनरी गेओर्ग श्कूरहामर (Georg Schurhammer) का के अनुसार पादरी इस्तेवम को भारत आने वाला पहला अंग्रेज नहीं कहा जा सकता है; किन्तु, वह जलमार्ग से अफ्रीका का चक्कर लगाकर आने वाले पहले अंग्रेज़ अवश्य थे। वस्तुतः /शेरबोर्ने के बिशप सिगहेल्म (Sighelm of Sherborne) ऐसे पहले व्यक्ति थे। 


एंग्लो-सेक्सॉन क्रॉनिकल (Anglo-Saxon Chronicle) के अनुसार 883 में इंग्लैंड के राजा अल्फ्रेड (Alfred) ने भारत में स्थित सन्त थॉमस की समाधि की तीर्थयात्रा पर भेजा था। यद्यपि इसके अन्य कोई प्रमाण नहीं मिलते।

एंग्लो-सेक्सॉन क्रॉनिकल के इस अनुच्छेद में राजा अल्फ्रेड द्वारा सन्त थॉमस की समाधि के लिए दान भिजवाने का उल्लेख है।

883: Sigehelm and Athelstan took to Rome—and also to St Thomas in India and to St Bartholomew—the alms which King Alfred had vowed to send there when they beseiged the raiding-army in London; and there, by the grace of God, they were very successful in obtaining their prayers in accordance with those vows. 


[883: सिगहेल्म और एथेलस्टन रोम ले गए - और भारत में सेंट थॉमस और सेंट बार्थोलोम्यू के पास भी - वह दान जिसे राजा अल्फ्रेड ने तब भेजने का वचन दिया था; जब उन्हें लन्दन में छापा मारने वाली सेना ने घेर लिया था; और वहाँ, भगवान की कृपा से, वे उन प्रतिज्ञाओं के अनुसार अपनी प्रार्थनाएँ प्राप्त करने में बहुत सफल रहे। ]


इन तथ्यों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि :—

भारत में प्रथम अंग्रेज़ तीर्थयात्री : शेरबोर्ने के सिगहेल्म (883)

भारत में उत्तमाशा अन्तरीप के समुद्री मार्ग से आने वाले प्रथम अंग्रेज़ यात्री : पादरी इस्तेवम (1579)

भारत में मुगल बादशाह (अकबर) से मिलने वाले प्रथम अंग्रेज़ : राल्फ़ फिच, विलियम लीड्स, तथा जेम्स स्टोरी (1584)

मुग़ल दरबार में पहले अंग्रेज़ जौहरी : जेम्स स्टोरी (1584)

मुग़ल दरबार में पहले अंग्रेज़ व्यापारिक दूत (जहांगीर के दरबार में) : जॉन हॉकिन्स (1609)

भारत में कोई लड़ाई जीतने वाले पहले अंग्रेज़ : थॉमस बेस्ट (1612)

मुग़ल दरबार में पहले अंग्रेज़ राजदूत (जहांगीर के दरबार में) : थॉमस रो (1615)


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