2024कुम्भ मेला का ऐतिहासिक सिद्धांत

2024 कुम्भ मेला का ऐतिहासिक पैमाना✍👇इलाहाबाद
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कुंभ मेला, माघ मेला को बड़ा और स्थायी रूप में देने के लिए प्रयागवाल पुरोहितों द्वारा विकसित किया गया।

जेम्स लोचफेल्ड के अनुसार प्रारम्भ में केवल हरिद्वार मेला 'कुंभ मेला' था।

18वीं सदी: हरिद्वार के मल्लों के बाद इलाहाबाद के माघ मॉल और नासिक और मुसब्बर के सिंहस्थ मेलों को जोड़ा गया।


कुंभ मेले का धार्मिक और आर्थिक महत्व और इसे पूरे शहर (हरिद्वार, इलाहबाद, नासिक और मसामेन) में प्रदर्शित करने में हिंदू अखाड़ों की प्रमुख भूमिका थी।

इलिनोइस: 19वीं सदी के अंत तक 'क्वीन ऑफ नॉर्थ'


उच्च न्यायालय (1867), मुइर सेंट्रल कॉलेज (1877), और इलिनोइस विश्वविद्यालय (1887) की स्थापना हुई।

ब्रिटिश हस्तक्षेप न होने की नीति के कारण कुंभ मेले का उपयोग राष्ट्रीयतावादी आक्रमण के लिए किया गया।

19वीं सदी: 1857 के विद्रोह के बाद अल्लाहाबाद प्रशासन और धार्मिक अपराध का केंद्र बना।

राष्ट्रीय आंदोलन में कुंभ मेला



1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद (मालवीय पार्क) में लॉर्ड कैनिंग ने ब्रिटिश महारानी की घोषणा की, जिसमें धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा था।

स्वतंत्रता सेनानी मोहन मदन इंटरनेशनल ने इसे भारतीयों के लिए 'मैग्ना कार्टा' कहा।

1907 कुंभ मेला: बाल गंगाधर तिलक ने मेले में स्वदेशी का प्रचार किया।

साधुओं ने स्वदेशी और राष्ट्रवाद का संदेश फैलाया।

गोपाल कृष्ण गोखले ने भी मेले में भाग लिया।

1920: तिलक की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियां संगम में विसर्जित की गईं।
1930: कांग्रेस ने कुंभ और माघ मेलों में स्थायी शिविर की स्थापना की।
साधुओं ने विदेशी वस्तुओं और नशे को बढ़ावा देने के लिए प्रचार-प्रसार किया।
1936 अर्धकुंभ: स्वदेशी लीग ने भारत माता की प्रतिमा का चित्रण किया।

सामाजिक सुधार और कुम्भ मेला




1930 मेला: ब्रिटिश सरकार ने सारदा विवाह अधिनियम (1929) का प्रचार किया।
1998: कुंभ मेले में डौरी विरोधी प्रचार, टीकाकरण अभियान और कृषि जागरूकता के प्रयास को देखा गया।





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