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गणेश वंदन

 


मेरे गणपति नाथ जी।
हे मोदक प्रिय श्री महाकाय
सबके जीवन श्वास जी।।

हे सर्व आधार शिव-उमा सुत
कार्तिकेयम भ्रात जी।
हे विघ्नहर्ता त्रिलोककर्ता
सर्व बंधु आप जी।

हे विद्यावारिधि अतुलबलनिधि
श्री गजकर्ण गजानना।
हे सर्वमाता पिता सर्व
सर्वम् रुद्रप्रिय सर्वातमना।।

हे दीनबंधु दिनेश सुमुख
स्वरुप तरुण रमा सुतम्।
हे मुक्तिदायक भयत्रायक
श्री कीर्ति कवीश कृपाकरम्।।

हे एकदंत आनंदकंद
श्री सर्वस्वभाव सूतपात जी।
हे विष्णुप्रिय मंगल स्वरूप
यशस्वी यशस्कर ब्रह्म जी।।

हे सिद्धिदायक रिद्धीविनायक
श्री ओमकाराय नमो नमः।
हे सूर्य कोटी प्रथमपूज्या
भवान गौरी सुतावरम्।।

हे शुभगुणम् श्वेतम् भगवान्
लाभदाय दिगंबरा।
हे परमसत्य सर्वसुखकर
जयतु जय श्री शंकरा।।

हे दुखहर्ता सुखकर्ता
श्री सर्वकार्ये जय प्रखर।
हे प्रभु निज सेवक जान मम्
तव चरण वंदन स्वीकार कर।।

हे सर्व हृदयेश अनुपम छवि
श्री गणपति गणराज जी।
हे स्वास्तिकेय नयनप्रिये
सफल कीजै सब काज जी।।

हे गणाध्यक्ष गणराज राजा
श्री सर्वविदित सर्वोत्तमा।
हे भालचंद्र परम प्रताप
श्री गौरी तनय श्री यमा।।

हे मुषनाथ श्री क्षम्यस्वामी
जगतपाल लंबोदरम्।
हे सर्वसमये सर्वलोके
सर्वशक्ति सुधामयम्।।

हे वीणाधारी त्रिशूलपाणी
पीतवस्त्र प्रथमाक्षरम्।
हे आदि अन्त-अनन्त असीम
परमछवि त्वम् सुन्दरम्।।

हे मयूरेश सर्वेश शुध्दाय
समृद्धम् कुरूमे सदा।
हे वसुन्धरेश देवादि देव
त्वम् सर्वेक्ष सुसर्वदा।।

त्वम् सर्वेक्ष सुसर्वदा।
त्वम् सर्वेक्ष सुसर्वदा।।






वक्रतुण्ड महाकाय …’ तथा अन्य छंद

अधिकांश हिंदू परिवारों-समुदायों में किसी भी शुभकार्य का आरंभ प्रायः गणेश वंदना से किया जाता है । इसी परंपरा के अनुरूप कार्यारंभ को बहुधा उसके ‘श्रीगणेश’ से भी पुकारा जाता है । वैवाहिक निमंत्रण-पत्रों पर देवाधिदेव गणेश की आकृति एवं उनकी स्तुति या प्रार्थना के श्लोक का उल्लेख आम प्रचलन में है । आजकल विवाहों का ‘मौसम’ चल रहा है । हिंदुओं में ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर ही पारंपरिक वैवाहिक मुहूर्त तय किए जाते हैं । वर्ष भर में कुछ गिने हुए दिन ही विवाह-योग्य मुहूर्त नियत होते हैं, और वे भी कुछ चुने हुए महीनों में । अतः इन दिनों एक साथ कई परिवारों में विवाह संस्कार संपन्न किए जाते हैं, और फलस्वरूप कई लोगों को मित्रों-परिचितों से अलग-अलग साजसज्जा के ढेरों निमंत्रण एक साथ मिलते हैं । जैसा पहले कह चुका हूं, इनमें गणेश वंदना के छंद प्रायः पढ़ने को मिलते हैं । मुझे प्राप्त होने वाले निमंत्रणों में निम्नांकित श्लोक सबसे अधिक देखने को मिलता है:

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

हे वक्रतुण्ड, महाकाय, करोड़ों सूर्यों के समान आभा वाले देव (गणेश), मेरे सभी कार्यों में विघ्नो का अभाव करो, अर्थात् वे बिना विघ्नों के संपन्न होवें ।

गणेशजी को वक्रतुण्ड पुकारा गया है । तुण्ड का सामान्य अर्थ मुख या चोंच होता है, किंतु यह हाथी की सूंड़ को भी व्यक्त करता है । गणेश यानी टेढ़ीमेढ़ी सूंड़ वाले । उनका पेट या तोंद फूलकर बढ़ा हुआ, अथवा भारीभरकम है, अतः वे महाकाय – स्थूल देह वाले – हैं । उनकी चमक करोड़ों सूर्यों के समान है । यह कथन अतिशयोक्ति से भरा है । प्रार्थनाकर्ता का तात्पर्य है कि वे अत्यंत तेजवान् हैं । निर्विघ्न शब्द प्रायः विशेषण के तौर पर प्रयुक्त होता है, किंतु यहां यह संज्ञा के रूप में है, जिसका अर्थ है विघ्न-बाधाओं का अभाव । तदनुसार निहितार्थ निकलता है सभी कार्यों में ‘विघ्न-बाधाओं का अभाव’ रहे ऐसी कृपा करो, अर्थात् विघ्न-बाधाएं न हों ।

प्रार्थना का यह श्लोक कइयों के लिए सुपरिचित होगा । मैं इसकी चर्चा विशेष प्रयोजन से कर रहा हूं । मैंने देखा है कि यह छंद लगभग सदा ही त्रुटिपूर्ण तरीके से लिखित रहता है । अक्सर यह निम्न प्रकार से लिपिबद्ध रहता है:

वक्रतुण्ड महाकाय कोटि सूर्य सम प्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥

अथवा मिलती-जुलती त्रुटियों के साथ । इसमें पहली त्रुटि यह है ‘सूर्य कोटि’ न होकर ‘कोटिसूर्य’ होना चाहिए । करोडों सूर्यों के समुच्चय या समूह के लिए सामासिक शब्द है ‘कोटिसूर्य’ = करोड़ों सूरज । दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत के नियम सामासिक शब्दों के घटकों के बीच रिक्ति (स्पेस) की अनुमति नहीं देते हैं । अतः इसे ‘कोटि सूर्य’ नहीं लिख जा सकता है । आगे इस पर भी ध्यान दें:

सूर्यकोटिसमप्रभ

जिसका अर्थ है करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाला है जो वह । यह स्वयं बड़ा-सा सामासिक शब्द है और इसके अवयवों को बिना रिक्तियों के मिलाकर लिखना अनिवार्य है । कहने का तात्पर्य है कि समासजनित शब्दों के अंतर्गत रिक्तियां नहीं होनी चाहिए । मैंने देखा है कि निमंत्रण पत्र जैसे दस्तावेजों में संस्कृत श्लोकों की वर्तनी एवं उसमें उपलब्ध शाब्दिक क्रम कभी-कभी दोषपूर्ण रहते हैं । इसका कारण कदाचित् यह है कि इन श्लोकों को उद्धृत करने वाले अधिकतर लोग संस्कृत के ज्ञाता नहीं होते हैं, अथवा उनका ज्ञान अपर्याप्त होता है । बहुत संभव है कि वे विभिन्न श्लोकों को अन्य निमंत्रण-पत्रों से लेते होंगे, या ऐसे स्रोत से लेते होंगे जहां किन्हीं कारणों से वे दोषपूर्ण मुद्रित हों । एक बार उनका त्रुटिपूर्ण पाठ व्यवहार में आ जाए और वही प्रचारित हो जाए तो उक्त प्रकार की गलती देखने में आने लगेगी ही ।

उपर्युक्त छंद से साम्य रखने वाला एक और छंद मेरे देखने आया है । वह है:

विनायक नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय ।
अविघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

सदैव लड्डुओं के प्रेमी हे विनायक, तुम्हें नमस्कार है , हे देव, मेरे सभी कार्यों में विघ्नों का अभाव पैदा करो, अर्थात् वे निर्विघ्न संपादित हों ।

इस श्लोक के ‘

नमामो भजामः ॥

(यतः बुद्धिः-अज्ञान-नाशः मुमुक्षोः यतः सम्पदः भक्त-सन्तोषिकाः स्युः यतः विघ्न-नाशः यतः कार्य-सिद्धिः सदा तम् गणेशम् नमामः भजामः ।)

जिनकी कृपा से मोक्ष की इच्छा रखने वालों की अज्ञानमय बुद्धि का नाश होता है, जिनसे भक्तों को संतोष पहुंचाने वाली संपदाएं प्राप्त होती हैं, जिनसे विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं और कार्य में सफलता मिलती है, ऐसे गणेश जी का हम सदैव नमन करते हैं, उनका भजन करते हैं।

श्रीगणेश के 12 नाम

1. वक्रतुण्डाय
धीमहि तन्नो दन्ति
प्रचोदयात।

2. विश्वरूपेण
हे गणपति देव
तुम्हें प्रणाम।

3. हे धूम्रवर्ण
जीवन के आधार
तेरी जय हो।
4. हे भालचन्द्र
विघ्न के विनाशक
मोदक भोग।

5. हे गौरी सुत
रिद्धि-सिद्धि के भर्ता
नमस्करोमि।

6. कृष्णपिंगाक्ष
सुर: प्रियाय: नम:
लम्बोदराय।

7. हे महाकाय
सर्व विघ्नशामक
रक्षा कवच।

8. एकदन्ताय
सर्व शांतिकारक
शुभं करोति।

9. गणाधिपति
आत्मा के मूर्तिमान
स्वरूप तुम।

10. गजमस्तक
बुद्धि बल के स्वामी
विस्तीर्ण कर्ण।

11. हे विनायक
ज्ञान, विवेक, शील
साक्षात ब्रह्म।

12. विघ्नराजेन्द्रं
मस्तक है विशाल
कुशाग्र बुद्धि।

गणेश वंदना

हे एकदंत विनायकं तुम हो जगत के नायकं।
बुद्धि के दाता हो तुम माँ पार्वती के जायकं।।
है एकदंत विनायकं तुम हो जगत के नायकम….ॐ हरि ॐ

गणपति है वकर्तुंडंम, एकदंतम गणपति है,
कृष्णपिंगाक्षम गणपति, गणपति गजवक्त्रंमम….
है एकदंत विनायकं तुम हो जगत के नायकम।
बुद्धि के दाता हो तुम माँ पार्वती के जायकं।।….ॐ हरि ॐ

गणपति लम्बोदरंम है, विकटमेव भी है गणपति
विघ्नराजेंद्रम गणपति, हो तुम्ही धूम्रवर्णमंम।।
है एकदंत विनायकं तुम हो जगत के नायकम।
बुद्धि के दाता हो तुम माँ पार्वती के जायकं।।….ॐ हरि ॐ

भालचंद्रम गणपति है, विनायक भी गणपति है,
गणपति एकादशं है, द्वादशं तू गजाननंम।।
है एकदंत विनायकं तुम हो जगत के नायकम।
बुद्धि के दाता हो तुम माँ पार्वती के जायकं।।….ॐ



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